बुधवार, 11 नवंबर 2009

"तिरुपति "

भगवान् वेंकटेश्वर स्वामी ,कलयुग के अवतार ,श्री निवासन (बालाजी )भगवान् को मेरा शत -शत नमन है मद्रास से १५१किलो मी की दुरी पर सप्तगिरियों के बीच तिरुमलै पर्वत पर स्थित भगवान् वेंकटेश्वर का मन्दिर अद्भुत है यहाँ मै तीसरी बार आ रही थी पहली बार आई तब बहुत छोटी थी ,एक धुंधली याद बस है ,दूसरी बार आई तब भारी भीड़ होने के कारण भगवान् बालाजी के दर्शन ठीक से नही हो सके थे इस बार मानो भगवान् ने स्वयं मुझे बुलाया हो ऐसा जान पड़ रहा था चारो तरफ़ ठण्ड और कोहरों के बीच यहाँ का मौसम अलौकिक जान पड़ रहा था
मानव जीवन आज तक अपने होने का ऋण ही तो चुकता आया है मैंने भगवान् वेंकटेश्वर के सामने ख़ुद को ही समर्पित कर दिया है मेरे आँख से आंसू थम ही नही रहे थे ,एक अपूर्व शान्ति मानो मेरा कवच बन गयी हो मै इस दिव्या मन्दिर आ कर अपने को हमेशा धन्य मानती हु
अपने परिवार के साथ इस मनोरम यात्रा में मैंने जीवन के विभिन्न आयाम देखे वर्तमान समय से कही ज्यादा समृद्धि मुझे प्राचीन राजाओ की श्रद्धा और कलाकौसल से ज्ञात हुआ है आज चाह कर भी इसकी पुनरावृति नही हो सकती
बालाजी मन्दिर तीन परकोटो से घिरा हुआ है जिसमे कई मंडपम है इन पर गोपुरम बने हुए है जिन पर स्वर्ण कलश स्थापित है स्वर्ण द्वार के सामने "तिरुमहामंडपम "है मन्दिर के सिंहस्थद्वार को "पड़ीकावली "कहते है इस द्वार के भीतर भगवान् वेंकटेश्वर के भक्त नरेशों और उनकी रानी के विग्रह स्थापित है
प्रथम व् द्वितीय द्वार के मध्य की प्रदिक्ष्ना को "सम्पिंग"प्रदिक्ष्ना कहते है इस पर विरज नामक कुआ है कहा जाता है श्री बालाजी के पाँव के नीचे से विरजा नामक नदी निकलती है जिसका पानी इस कूप में आता है इसी प्रदिक्ष्ना में "पुष्प कूप "है जिस में बालाजी को चढाये गए तुलसी दल को बाटने के बजाय इस पर डाला जाता है
द्वितीय द्वार पर जो प्रदिक्ष्ना है उसे "विमान "प्रदिक्ष्ना कहते है इसमे योग नुर्शिंग ,श्री वरदराज ,श्रीरामानुजाचार्या ,गरुड़ आदि के विग्रह स्थापित है
तीसरे द्वार के भीतर गर्भगृह में एक प्रदिक्ष्ना है जो बैकुण्डप्रदिक्ष्ना के नाम से जाना जाता है यह केवल पौष शुक्ल एकादशी को ही खुलता है भगवान् बालाजी के मन्दिर के सामने स्वर्णमंडित स्तम्भ है तथा द्वार पर ही जय-विजय की मुर्तिया है इसी मंडप के एक ओर "हुंडी "नामक हौज है जिस पर दर्शनार्थी बालाजी को चढ़ने वाला कर अर्थात द्रव्य आभूषण आदि चढाते है
जगमोहन से चौथे द्वार को पार करके पाँचवे द्वार के भीतर भगवान् वेंकटेश्वर स्वामी का ७ फुट ऊँचा श्याम वर्णीय प्रतिमा स्थापित है भगवान् अपने हाथ में शंख ,पद्म ,चक्र ,गदा लिए खड़े है भगवान् के दोनों ओर श्रीदेवी और भूदेवी की प्रतिमा स्थापित है भगवान् के विग्रह पर भीमसेनी कर्पुर का तिलक किया जाता है जो प्रसाद के रूप में बिकता है इस विग्रह के सामने खड़ी हो कर मै साक्षात् श्री हरी के सामने खड़ा महसूस कर रही थी वेंकटाचल पर्वत पर ही अनेक तीर्थ-पांडव तीर्थ ,पापनाशनं तीर्थ ,आकाशगंगा ,जाबालीतीर्थ ,बैकुण्ड तीर्थ ,चक्रतीर्थ ,कुमार्धारा ,रामकृष्ण तीर्थ,घौनतीर्थ ,आदि है जो दर्शनीय है यहाँ की यात्रा कहने से नही वहा जाने से ही ज्ञात होता है इस दिव्य स्थली की यात्रा का सौभाग्य हर किसी को मिले यही  भगवान् वेंकटेश्वर स्वामी से प्रार्थना है