मेरी यात्रा के स्वर्णिम स्मरण में भगवान् जगननाथ पूरी की यात्रा भी शामिल है |१९८७ में मै बहुत छोटी थी मुझे याद है जीवन में यह दूसरी बार मै समुन्द्र के दर्शन कर रही थी |भगवान के प्रति मेरी आस्था केवल उतनी ही थी जितनी की मम्मी पापा को पूजा करते देखा किया करती थी |भगवान् जगननाथ "जिसके हाथ न पैर "केवल देख रहा है पर कुछ कर नहीं सकता |कलयुग में भगवान् ने अपनी आँखे लगभग बंद कर दी है |केवल अवतार स्वरूप भगवान जगननाथ दुनिया को देख रहे है और कह रहे हो "अपना हाथ जगननाथ "मै देख सकता हूँ और संबल भी दूंगा पर अपना काम तुम्हे स्वयं करना पड़ेगा |
मुझे आज भी वो दिन याद है पापा ने अचानक ही जगननाथपूरी की यात्रा बना लिए थे | हमारे पारिवारिक मित्र और उनका परिवार भी हमारी इस यात्रा में शामिल थे |हमें नहीं मालूम था रथ यात्रा के पंद्रह दिन पहले ही भगवान् जगननाथ का मुख्य मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है |यात्रा जीप में होनी थी , सफ़र काफी लम्बा था इसलिए संबलपुर हाल्ट करके आगे बढ़ना निर्धारित हुआ |बारिश का मौसम शुरू हो चूका था पर इतना बारिश मैंने जीवन में कभी नहीं देखा |निकलते तक सब अच्छा था अचानक घनघौर घटा झा गया इतनी तेज बारिश आंधी तूफ़ान के चलते सड़क तक दिख पाना मुश्किल हो गया था | जीवन में पहली बार बड़े बड़े वृक्षों को गिरते देख रही थी मानो वो इस यात्रा को रोकने के लिए अमादा हो रहे हो |यात्रामुहूर्त का मुझे ज्ञान नहीं था पर मम्मी पापा के मुख से सुन रही थी हमने यात्रा के लिए गलत समय का चयन किया |किसी तरह रात को हम संबलपुर पहुंचे और दुसरे दिन जगननाथ पूरी पहुँच गये |एक लार्ज में रुकने की व्यवस्था कर हम स्नान ध्यान कर मंदिर के प्रागणन पर पहुंचे अन्य छोटे छोटे मंदिरों का दर्शन कर हम मुख्या द्वार पर पहुचे तो पता चला की मंदिर का पट बंद है |हम सब को बहुत दुःख हुआ की इतनी कठिनाई से हम यहाँ तक पहुचे पर भगवान् श्रीजगननाथ के दर्शन का सौभाग्य हमे प्राप्त नहीं हुआ रस्ते भर की कठिनाइयाँ और रास्ता रोकते भीमकाय वृक्षों का गिरना ये सब अप्रत्याशित था |
भगवान् श्री जगन्नाथ पूरी चार परम धामों में एक धाम माना गया है |ऐसी मान्यता है की सतयुग में बदरीनाथ ,त्रेता में रामेश्वरम ,द्वापर में द्वारकापुरी ,और कलयुग में श्रीजगन्नाथ पूरी ही पावनकारी धाम है | पहले यहाँ नीलांचल नामक पर्वत था और नीलमाधव की श्रीमूर्ति भी यहाँ इसी पर्वत में स्थापित थी |जिसकी देवता अराधना करते थे |यह पर्वत भिमी में चला गया और देवता मूर्ति अपने साथ ही ले गए |पर उनकी स्मृति में इस क्षेत्र को नीलांचल कहा जाता है|श्री जगन्नाथ मंदिर पर लगा चक्र नीलच्छ्त्र कहलाता है |जहाँ तक यह चक्र दिखाई देता है वहा तक श्रीजगन्नाथ पूरी है |
इस क्षेत्र के अनेक नाम है |इसे श्रीक्षेत्र ,पुरुषोत्तमपूरी और शंखक्षेत्र भी कहते है क्योकि इस पुरे पुण्य स्थल की आकृति शंख के समान है | शाक्त इसे उड्डीयन पीठ कहते है |कहा जाता है यहाँ सती माता का नाभि गिरा था |अब मै पुनः श्री जगन्नाथ पूरी के दर्शन को जा रही हूँ |विश्वास है भगवान् मेरी इस यात्रा को सफल करेगे .............क्रमश :


