बुधवार, 18 जनवरी 2012

त्रिवेंद्रम:पद्मनाभ मंदिर




त्रिवेंद्रम मेरे पिता का गृहग्राम |केरल की राजधानी मानी जाने वाली यह दिव्या नगरी का शुद्ध नाम तिरुअनंतपुरम है |पुराणों में इसका उल्लेख अनंतवनम के नाम से है |यह प्राचीन त्रावनकोर राज्य तथा वर्तमान में त्रावनकोर -कोचीन प्रदेश ,केरल की राजधानी है |नगर के मध्य में यहाँ के राजा का किला है |किले के भीतर ही पद्मनाभ मंदिर है जिसमे भगवन विष्णु पद्मनाभ स्वरुप में अनन्त शैया में प्रतिस्थापित है |इन्हें अनन्त शयन भी कहते है |यह मंदिर  हमारे घर के पास ही होने के कारण मै केरल जाने पर इस मंदिर के हमेशा दर्शन करती हु |शेषशैया में शयन किये भगवान पद्मनाभ की विशालमूर्ति देखने पर लगता है मानो सक्षात भगवान लेटे हो |मंदिर की दिव्यता वहा जाने पर ही बयान हो सकती है |मंदिर के अन्दर कई गोपुरम है जिनमे वास्तुकला का अतिप्राचीन कलाकौसल देखने को मिलता है |मुख्या मंदिर के चारो और देवी देवताओ के विभिन्न मुद्राओ में मुर्तिया स्थापित है जो प्राचीनकाल के राजाओ की ख्याति .समृद्धि और  उत्कृष्ट कारीगरों के कला का स्वयं परिचय देती है |भगवान् की इतनी बड़ी मूर्ति मैंने कभी नहीं देखि न ही अन्य जगह पर होगी |
भगवान्  के नाभि से निकले कमल पुष्प में ब्रम्हाजी विराजमान है |भगवान का दाहिना हाथ शिवलिंग के ऊपर पर स्थित है |इस मूर्ति का श्रीमुख के दर्शन पहले द्वार से वक्षस्थल तथा नाभि के दर्शन  द्वितीय द्वार से और श्री चरणों के दर्शन तीसरे द्वार से होते है |मंदिर से बाहर आकर प्रदिक्षना करने पर मंदिर के पूर्व में स्वर्णमंडित गरुड स्तम्भ है |दक्षिण भाग में हरिहर पुत्र का छोटा मंदिर है |मंदिर के पश्चिम भाग में श्रीकृष्ण का मंदिर है |मंदिर के दक्षिण भाग में एक शिशु विग्रह है |श्रीदेवी ,भूदेवी ,नीलादेवी भगवान की तीन शक्तिओ का विग्रह भी शोभनीय है |वर्ष २०१० में मेरी केरल यात्रा के दौरान मुझे सपरिवार पुनः पद्मनाभ स्वामी के दर्शन का सौभाग्य मिला |मंदिर के अहाते में पहुचते ही काफी भीड़ के कारण धक्का -मुक्की में भगवान के दर्शन मिले पसीने से तर -बदर मंदिर के एक कोने में जा कर मै अपनी मम्मी के साथ खड़ी  हो गयी |मंदिर की मूर्ति और अन्य विग्रह काले कसौटी के पत्थर से बना हुआ है जिस पर स्वर्ण की परत जड़ दी गयी है | |नमी के कारण जमीं पर मेरे पैर फिसलने लगे थे |मैंने मम्मी से यु ही तुक्के में कहा जहाँ पर खड़ी हु वहा जरुर कुछ है |नीचे कही तहखाना तो नहीं ?यहाँ की उष्णता और वातावरण सहज नहीं है |नीचे मेरे पैर के पास किसी का चढाया सिक्का गिरा हुआ था मैंने उसे उठा कर दान पेटी में चढाया और मम्मी से कहा की यहाँ बहुत धन है |और केरल से आने के बाद २०११ में जब पद्मनाभ स्वामी क्षेत्र  में अत्यधिक सोने चांदी का खजाना  मिला। सुन कर मै और मम्मी एक दुसरे का मुह देखने लगे |भगवान् के गर्भ गृह में ना जाने कितने खजाने है |पर मै उनका सानिध्य अपने जीवन में पद्मपुष्प की तरह चाहती हु |जो मुझे विकारों से हमेश मुक्त रख मुझे ज्ञान का खजाना दे |

"भद्राचलम









मेरी यात्रा कि इस कड़ी में यह यात्रा भी मेरे जीवन कि महत्वपूर्ण कड़ी है |जगदलपुर (छत्तीसगढ़ ) १८४ किमी "कोंटा" में मेरे मामा जी रहते है |हम हर साल गर्मियों कि छुट्यो में कही न कही अवश्य जाया करते थे इस बार पापा ने कोंटा और भद्राचलम जाने का प्रोग्राम बना लिया था |अप्रैल कि भीषण गर्मी में यात्रा मेरे लिए हमेशा कष्टकारी रहा करती है |गर्मियों का मौसम शुरू होते ही फ्रिज का मुख  मानो मेरी तरफ खुल जाता हो |मै बचपन से ही खोजी प्रवृत्ति कि रही हु |क्यों?किसलिए ?यही दिमाग में घुमा करता रहता |जीवन में महानदी के सिवाय मैंने कभी बड़ी नदी नहीं देखि थी |इस बार कि यात्रा में गोदावरी नदी के दर्शन होने थे इसलिए भी इस यात्रा के लिए मै पूरी तरह तैयार थी |यहाँ से सोच कर निकली थी कि नदी में पहुच कर मै ढेर सारे पत्थर इकट्ठे करुगी और यहाँ आने पर उसे इक्युव्रियम में सजा कर रखुगी |सच है बचपन कभी लौट कर नहीं आता |पर जब पीछे पलट कर देखती हु तो यादो में काफी यादगार पल है जिसे मैंने जिया और समय ने उसे जिवंत कर दिया |कोंटा पहुच कर हम एक दो दिन विश्राम किये फिर भद्राचलम कि ओर निकल पड़े |कोंटा से 68 कि मी दूर भद्राचलम कि यात्रा मै आज भी नहीं भूल सकती |मेरा जन्म जगदलपुर में हुआ है इसलिए प्रायः मुझे सब बस्तरहीन कह कर  चिढाया करते |मामा मुझे डराने के लिए अबूझमाढ़ के आदिवासियों कि वेषभूषा ,तीर कमान और मनुष्यों को खा जाने वाली बात कह कर खूब डराया करते थे |संयोग से बस में मेरे  बगल में तीर कमान वाले लोग ही आ कर बैठ गए मेरी तो सिट्टी -पिट्टी ही गूम हो गयी |मामा सामने वाले सिट पर बैठे मेरा चेहरा देख कर मुस्कुराए जा रहे थे |पर इस यात्रा में मेरा सारा भय  जाता रहा|अपनी सुरक्षा सभी चाहते है |तभी बस कंडक्टर ने टिकट के लिए उन्हें जोर से आवाज लगाया और विशुद्ध भाषा में बात करने लगा | तीर कमान पकड़ा व्यक्ति बड़ी सहजता से उठ कर टिकट लेने लगा ,तब मै सोच रही थी ज्ञान का आभाव इन्हें है ?या कंडक्टर को ?उनकी सहजता भोलापन साफ झलक रहा था |इन्सान केवल प्रेम का भूखा है उपेक्षित व्यवहार ही इन्सान को हिंसक बना देता है |भद्राचलम पहुच कर मैंने गोदावरी नदी के दर्शन किये |गोदावरी तट पर ही भगवान् श्रीराम जी का प्राचीन मंदिर है |मुख्य मंदिर के पास ही 20 -25 छोटे मंदिर है |मुख्य मंदिर में श्री राम ,जानकी एवं लक्ष्मण कि मुर्तिया है |अन्य मंदिरों में हनुमान ,गणेश आदि देवी देवताओ कि मुर्तिया है |इस मंदिर को संत रामदास ने बनवाया था |गोदावरी नदी कि सात धाराए है जो गोदावरी स्टेशन से कोटिपल्ली तक विस्तृत है |जिसे सप्तगोदावरी तीर्थ कहते है |इन मुख्य धाराओ का नाम -तुल्याभागा ,आत्रेयी ,गौतमी ,वृद्ध-गौतमी ,भरद्वाजा ,कौशिकी ,और वशिष्ठ है |मैंने गोदावरी तट से ढेर सारे पत्थर इकाट्ठे किये जो आज भी यादगार के रूप में मेरी मछलियों को नदी में तैरने का अहसास दिलाते है |
भगवान् श्री रामचन्द्र जी कलयुग में श्रीनिवासन के रूप में तिरुमला में विराजमान है लेकिन यहाँ आने पर ऐसा लगता है हम राम जी के युग में आ गये ।भगवान से मेरी यही प्रार्थना है दक्षिण बस्तर में नक्सलवादिता ,आतंक और खौफ का जीवन यही अंत ले और फिर से राम का युग आये ।गोदावरी नदी के तट की गरिमा खून से नहीं सुबह और शाम की लालिमा  से गौरवशाली सत युग की जीवन की गाथा को दोहराए ।