मेरी यात्रा कि इस कड़ी में यह यात्रा भी मेरे जीवन कि महत्वपूर्ण कड़ी है |जगदलपुर (छत्तीसगढ़ ) १८४ किमी "कोंटा" में मेरे मामा जी रहते है |हम हर साल गर्मियों कि छुट्यो में कही न कही अवश्य जाया करते थे इस बार पापा ने कोंटा और भद्राचलम जाने का प्रोग्राम बना लिया था |अप्रैल कि भीषण गर्मी में यात्रा मेरे लिए हमेशा कष्टकारी रहा करती है |गर्मियों का मौसम शुरू होते ही फ्रिज का मुख मानो मेरी तरफ खुल जाता हो |मै बचपन से ही खोजी प्रवृत्ति कि रही हु |क्यों?किसलिए ?यही दिमाग में घुमा करता रहता |जीवन में महानदी के सिवाय मैंने कभी बड़ी नदी नहीं देखि थी |इस बार कि यात्रा में गोदावरी नदी के दर्शन होने थे इसलिए भी इस यात्रा के लिए मै पूरी तरह तैयार थी |यहाँ से सोच कर निकली थी कि नदी में पहुच कर मै ढेर सारे पत्थर इकट्ठे करुगी और यहाँ आने पर उसे इक्युव्रियम में सजा कर रखुगी |सच है बचपन कभी लौट कर नहीं आता |पर जब पीछे पलट कर देखती हु तो यादो में काफी यादगार पल है जिसे मैंने जिया और समय ने उसे जिवंत कर दिया |कोंटा पहुच कर हम एक दो दिन विश्राम किये फिर भद्राचलम कि ओर निकल पड़े |कोंटा से 68 कि मी दूर भद्राचलम कि यात्रा मै आज भी नहीं भूल सकती |मेरा जन्म जगदलपुर में हुआ है इसलिए प्रायः मुझे सब बस्तरहीन कह कर चिढाया करते |मामा मुझे डराने के लिए अबूझमाढ़ के आदिवासियों कि वेषभूषा ,तीर कमान और मनुष्यों को खा जाने वाली बात कह कर खूब डराया करते थे |संयोग से बस में मेरे बगल में तीर कमान वाले लोग ही आ कर बैठ गए मेरी तो सिट्टी -पिट्टी ही गूम हो गयी |मामा सामने वाले सिट पर बैठे मेरा चेहरा देख कर मुस्कुराए जा रहे थे |पर इस यात्रा में मेरा सारा भय जाता रहा|अपनी सुरक्षा सभी चाहते है |तभी बस कंडक्टर ने टिकट के लिए उन्हें जोर से आवाज लगाया और विशुद्ध भाषा में बात करने लगा | तीर कमान पकड़ा व्यक्ति बड़ी सहजता से उठ कर टिकट लेने लगा ,तब मै सोच रही थी ज्ञान का आभाव इन्हें है ?या कंडक्टर को ?उनकी सहजता भोलापन साफ झलक रहा था |इन्सान केवल प्रेम का भूखा है उपेक्षित व्यवहार ही इन्सान को हिंसक बना देता है |भद्राचलम पहुच कर मैंने गोदावरी नदी के दर्शन किये |गोदावरी तट पर ही भगवान् श्रीराम जी का प्राचीन मंदिर है |मुख्य मंदिर के पास ही 20 -25 छोटे मंदिर है |मुख्य मंदिर में श्री राम ,जानकी एवं लक्ष्मण कि मुर्तिया है |अन्य मंदिरों में हनुमान ,गणेश आदि देवी देवताओ कि मुर्तिया है |इस मंदिर को संत रामदास ने बनवाया था |गोदावरी नदी कि सात धाराए है जो गोदावरी स्टेशन से कोटिपल्ली तक विस्तृत है |जिसे सप्तगोदावरी तीर्थ कहते है |इन मुख्य धाराओ का नाम -तुल्याभागा ,आत्रेयी ,गौतमी ,वृद्ध-गौतमी ,भरद्वाजा ,कौशिकी ,और वशिष्ठ है |मैंने गोदावरी तट से ढेर सारे पत्थर इकाट्ठे किये जो आज भी यादगार के रूप में मेरी मछलियों को नदी में तैरने का अहसास दिलाते है |
भगवान् श्री रामचन्द्र जी कलयुग में श्रीनिवासन के रूप में तिरुमला में विराजमान है लेकिन यहाँ आने पर ऐसा लगता है हम राम जी के युग में आ गये ।भगवान से मेरी यही प्रार्थना है दक्षिण बस्तर में नक्सलवादिता ,आतंक और खौफ का जीवन यही अंत ले और फिर से राम का युग आये ।गोदावरी नदी के तट की गरिमा खून से नहीं सुबह और शाम की लालिमा से गौरवशाली सत युग की जीवन की गाथा को दोहराए ।
भगवान् श्री रामचन्द्र जी कलयुग में श्रीनिवासन के रूप में तिरुमला में विराजमान है लेकिन यहाँ आने पर ऐसा लगता है हम राम जी के युग में आ गये ।भगवान से मेरी यही प्रार्थना है दक्षिण बस्तर में नक्सलवादिता ,आतंक और खौफ का जीवन यही अंत ले और फिर से राम का युग आये ।गोदावरी नदी के तट की गरिमा खून से नहीं सुबह और शाम की लालिमा से गौरवशाली सत युग की जीवन की गाथा को दोहराए ।




