शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

कन्याकुमारी

ततस्तीरे समुन्द्रस्य कन्यातीर्थमृपस्पृस्यते||

तीर्थं स्पृस्य राजेंद्र सर्वपापै:प्रमुच्यते ||

अर्थात कावेरी में स्नान करके मनुष्य समुन्द्र तटवर्ती कन्या तीर्थ में स्नान करे |इस कन्या तीर्थ का स्पर्श कर लेने मात्र ही मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है |कन्याकुमारी एक अंतरीप है |कन्याकुमारी के दक्षिण में हिन्दमहासागर ,पश्चिम में अरबसागर ,तथा पूर्व में बंगाल की खड़ी से घिरा हुआ है |


|पापविनाशं "काशी की गंगा के बाद कन्याकुमारी का समुन्द्र ही सबसे ज्यादा पवित्र है |"चैत्र पूर्णिमा को इस स्थान पर एक साथ बंगाल की खड़ी में चंद्रोदय तथा अरब सागर में सूर्यास्त दिखाई देता है |जो अद्भुत है |


कन्या कुमारी के इस त्रिकोणीय संगम क्षेत्र में कई तीर्थ है |बंगाल की खड़ी के समुन्द्र में सावित्री, गायत्री ,सरस्वती ,तथा कन्याविनायक आदि तीर्थ है |कहाँ जाता है सुचित्रं में शिव जी पर किया जलाभिषेक भूमि के भीतर से आकर इसी समुन्द्र में मिलता है |तट पर ही गणेशजी का मन्दिर है जो "इन्द्रकांत" विनायक के नाम से प्रसिद्द है |क्योकि इस विग्रह की स्थापना देवराज "इन्द्र "ने की थी |कन्याकुमारी माँ का भव्य रूप अत्यन्त ही मनोहारी है |कई द्वारो के भीतर माता हाथो में माला लिए स्थापित है |कहा जाता है माता का श्रंगार विशेष अवसरों में हीरकरत्नों से किया जाता है |मन्दिर के ही दक्षिण अग्रहार के बीच में भद्रकाली के मन्दिर है जो ५१ पीठो में एक है |यहाँ माता "सती"का पृष्ठ भाग गिरा था |मन्दिर में चारो और अनेक देव विग्रह है ,उत्तर में पापविनाशनम पुष्कर्निया है |इसे" मंडूकतीर्थ "भी कहते है |कन्या कुमारी से १२ किलोमीटर की दुरी पर ही "नागरकोइल "नागराज का मन्दिर है कहते है मन्दिर के चारो और सर्प वास करते है |हर रविवार ,एवं आइल्या (अश्लेशा )नक्षत्र के दिन दूध लेकर लोगो की काफी भीड़ रहती है |लोग कहते है यहाँ सर्प दंश से या विष से कभी किसी की मृत्यु नही होती |नागरकोइल से ही चार मील दूर "शुचीन्द्रम "जाहाँ परम शिव स्थिर हो गए है |यह भगवान् स्थानुमालका मन्दिर है |इस मंदिर का प्रधान आकर्षण और विशेषता १८ फुट का ऊँचा हनुमानजी की प्रतिमा है |कन्याकुमारी की ये मेरी दूसरी बार यात्रा रही है |बचपन में जब पहली बार कन्याकुमारी आई तो पहली बार समुन्द्र देख कर मन काँप उठा था |मुझे आज भी वो दिन याद है ,सब कुछ मेरे लिए अद्भुत और आश्चर्य कर देने वाला हुआ करता था |विवेकानन्द जी के बारे में किताबो में काफी कुछ पढ़ा था ,अध्यात्म ,आत्मज्ञान ,शान्ति ये केवल शब्द के जाल मात्र हुआ करते थे पर आज मै इसकी सार्थकता को समझ सकती हूँ |



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