सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

"रामेश्वरम "


द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ११वा ज्योतिर्लिंग "सेतुबंध रामेश्वरम"है |सन्२००१ में अपने यात्रा योग में इस दिव्या स्थली के दर्शन का सौभाग्य मुझे मिला |आज भी मुझे वो दिन याद है |शिव जी के प्रति मुझे बहुत आस्था रही है ,बचपन से ही भगवान् शिव जी की बहुत सी कथाये पढ़ती रही थी ,उन कथाओं में द्वादशज्योतिर्लिंगों का वर्णन आज जैसे साक्षीभुत होने जा रहा हो ,शिवजी के प्रति श्रद्धा ,पूजा अर्चना ,व्रत रखने की होड़ में सारीसखियों को पीछे छोड़ देने का प्रतिफल जैसे आज फलित हो रहा हो |भारत की दक्षिण सीमा के अन्तिम छोर में एक जीवन रेखा की तरह दिखाई देने वाला सेतुबंध आज मेरे सामने मानो शिवत्व की गाथा कहने जा रहा हो |

कहते है 'लंका पर चढाई करने से पहले श्रीराम ने इसी दिव्य स्थली पर बालू से शिवलिंग बना कर भगवान् शिव जी की पूजा कर उनसे आर्शीवाद माँगा था |श्री रामेश्वरम जी का मन्दिर १००० फुट लंबा तथा ६५० फुट चौडा और २५ फुट ऊँचा है |इस विशाल मन्दिर में शिव जी का हाथ ऊँचा लिंग स्थापित है मन्दिर में अनेक सुंदर शिवमुर्तिया एवं अन्य देव मुर्तिया है |बीचो बीच नंदी की एक विशाल मूर्ति है |मन्दिर के ही गर्भ स्थान पर शिव एवं पार्वतीकी चल मुर्तिया है |कहते है वार्षिकोत्सव में इन्ही मूर्तियों को स्वर्ण रजत से सुसज्जित कर सवारी निकाली जाती है |मन्दिर में २२ कुएं है ,इन कुए को "तीर्थ"कहा जाता है |इसके जल से स्नान करने का अलग ही महत्व है |कहते है ,भगवान् शिव ने अपने अमोघ वानो से इस कुपो का निर्माण किया था और कई तीर्थो का जल मंगवा कर इसमे डलवाया था |इनमे से कुछ नाम इस तरह है -गंगा ,यमुना ,गयाजी ,शंख ,चक्र ,कुमुद |यहाँ अन्दर के तीर्थ का पानी मीठा तथा बाहर का पानी खारा है |रामेश्वरम में ही एक दर्जन तीर्थ और है |जिनमे रामतीर्थ ,अमृत वाटिका ,हनुमान कुंडा ,सेतुमाधवा ,नंदी केश्वर ,एवं अष्ट लक्ष्मी मंडपम है |
इस स्थान की यात्रा करते समय मन खुश भी था और दुःख  भी |जीवन का यथार्थ और कल्पना वास्तव में दो कठिन रास्ते है |जब किसी रहस्य से परदा उठता है तब लगता है कल्पना में ही जी लिया होता तो ज्यादा अच्छा होता |भगवान् राम ने जाने कितनी कठिनाई से यहाँ तक की यात्रा की होगी ?आज २००० किलो मी .दूर रामेश्वरम तक पहुचना आसान  है|मर्यादा पुरुषोत्तम राम स्वयं देवता है ,पर मानव जीवन में कर उन्होंने भी काफी कठिनाइयों का सामना किया यहाँ तक पहुंचे |




श्री रामेश्वरम से ही १५-२० मील "धनुशकोटी  "नाम के स्थान पर हम निकल पड़े ,यह वो स्थान है जहाँ श्री रामजी ने अपने युद्ध योजना में विघ्न डालने वाले समुन्द्र गर्जना को अपने वाणो  से शांत किया था |यह वो स्थान है |जहाँ सभी महासागर शांत रूप में मिले हुए रामजी के आज्ञा का पालन आज भी कर रहे है |अपने सामने अथाह सागर को शांत रूप में देख कर मन अचानक द्रवित हो गया ,"क्या जीवन की यही अन्तिम यात्रा है ?एक चातक की तरह मानव जीवन इस अथाह पानी के सामने स्वाति के अमृत बूंद के लिए मानो तरस रहा हो "जीवन में सब कुछ पाने के बाद भी तो कोई संतुष्ट नही है |अचानक मेरी तन्द्रता टूटी तो देखा पानी का स्तर बढ़ चुका है पैर के निचे से सरकते रेत से डर लगता है |शायद जीवन में अचानक सी आई कठिनाई भी इन्सान को कुछ इस तरह ही हिला देती है |मन में संतोष से पहले असंतोष का भावः इन्सान को बहुत पीछे ले आता है |पर यहाँ कर मेरे मन में उत्साह है |अपने सामने समुन्द्र के शांत और अविरल लहरों से एक ही ज्ञान मिला जीवन में कितने भी उतार चढाव क्यो आए मुझे शांत रह कर अपना ही नही वरन सभी के लिए कुछ अच्छा ही करना है |अभी तक मेरी परछाई मुछसे पीठ करके बैठी थी तभी आवाज आया चलो गाड़ी गया है |


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