मदुरै कन्याकुमारी से २३२ किलो मी में स्थित है |यहाँ देवी मीनाक्षी एवं सुन्द्रेश्वरम का प्रसिद्ध मन्दिर है |वेगे नदी के तट पर बसा यह नगर ६७०६२४ घन फुट है |यहाँ २२ प्राचीरों में ४ गोपुरम है |जिनमे दक्षिण गोपुरम १६९ फुट ऊँचा है |सन २००१ में मदुरै की यात्रा मेरे लिए अपने जीवन के यादगार क्षणों में एक है |मानव जीवन में खास कर हिंदू समाज में संस्कारो का अत्यधिक महत्व है |मानव जीवन में १६ संस्कारो में "विवाह संस्कार "भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है |यहाँ आने पर इस संस्कार की दैविक महत्ता अपने आप में ही पूर्णता का संकेत देती जान पड़ती है |मैंने पहली बार इतनी शिल्पकृतियों वाला मन्दिर दक्षिण भारत के मंदिरों में ही देखा है |
कहा जाता है यहाँ पहले "कदम्ब "का वन था |कदम्ब के एक वृक्ष के नीचे भगवान् सुन्दरेश्वर का स्वयंभू लिंग था |देवता इसकी पूजा किया करते थे |वहा के श्रद्धालु नरेश मलय ध्वज को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने उस लिंगमूर्ति के स्थान पर मन्दिर व् नगर बनाने का संकल्प लिया |स्वप्न में भगवान् ने नरेश की प्रशंसा की और दिन में एक सर्प के रूप में आकर नगर की सीमा का निर्देश कर गए |पांडेय नरेश के कोई संतान नही था |राजा माल्याध्वज ने सपत्नी दीर्घ काल तक घोर तपस्या की |भगवान् शिव ने उन्हें दर्शन दे कर "कन्या "प्राप्ति का वरदान दिया |साक्षात् पार्वती ही अपने अंश से कन्या रूप में अवतरित हुई |उनके विशाल सुंदर नेत्रों के कारण उनके माता पिता ने उनका नाम "मीनाक्षी "रखा |देवी के युवती होने पर स्वयं सुन्द्रेश्वरण ने उनसे विवाह की इच्छा रक्खी |तब माता कंचनलता ने धूमधाम से उनका विवाह संपन्न कराय था |
मन्दिर के पूर्वी द्वार पर अष्ट शक्ति मंडप है |यहाँ ८ शक्ति प्रतिमा के कारण इसका नाम "अष्ट शक्ति मंडपम "नाम पड़ा यहाँ "तिरुविलैयाद्ल पुराण "के प्रसंग चित्रित है |मीनाक्षी नाय्क्की मंडपम ,और मदुलैपिल्ले मंडपम के द्वारा हम स्वर्ण पदमा तालाब की और आते है |तालाब के चारो और सुन्द्रेश्वरम के ६१ आश्चर्य जनक कार्यो का चित्रण किया गया है |तालाब के बीचो बीच झुला मंडपम है |
मन्दिर के गर्भ गृह में देवी "मीनाक्षी "कंधे पर तोता और हाथ में फूलो का गुच्छा लिए खड़ी है |माता के नेत्र में मानो स्नेह भरा हो और वातावरण स्वयमेव करुनामय हो गया हो |देवी के दर्शन कर मेरी आँख खुशी से भर आई |काफी भीड़ होने के बाद भीहम सब को देवी दर्शन मिला ,मन बहुत ही प्रसन्न रहा यात्रा की पुरी थकान मिट गई |मन्दिर से बाहार आने पर सुन्द्रेश्वरम के सामने विराट विघ्नेस्वर का मन्दिर है |सुन्द्रेश्वरम के ही सामने के ही मंडप के स्तुपो में मीनाक्षी के विवाह का चित्रण किया गया है |आगे बढ़ने पर अनेक स्तुपो में भगवान् शिव एवं अन्य देवी देवताओ के विभिन्न मुद्राओ में चित्रण है |"आरियार्नाथ मुदलियार "की अश्वरुध प्रतिमा है इन्होने इस दिव्य कलाकृतियों वाला मंडपम बनाया है |दोनों और कन्नाप्पर ,भिक्षत्नर ,चंद्रमती ,कुर्वन ,व् कुरुती की प्रतिमाये है |
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण और आश्चर्य तब हुआ जब मेरी नजर छत पर गई ,मन्दिर के छत में तमिल पंचांग को सूचित करने वाले ६० चक्रो का चक्रात्मक प्रस्तुतीकरण देखने लायक है |
यहाँ अर्जुन, रति ,मोहिनी ,कलिपुरुष ,विरली आदि की प्रतिमाये है |मन्दिर के ही पास १०० फुट लंबा ,९५० फुट चौडा मारियम्मन तेप्प्क्कुलम "नामक तालाब जो शहर के सीमावर्ती है |कहा जाता है चैत्र पूर्णिमा के ही दिन देवी मीनाक्षी का विवाह हुआ था |आज भी संयोग से वही देवी मीनाक्षी एवं सुन्द्रेश्वरम का सानिध्य हमारे साथ हमेशा रहेगा |
मदुरै की यात्रा मेरे लिए वास्तुकला का पर्याय बन गयी है |माता से अपने भावी जीवन और उद्देश्यों की मंगल कामना करते हुए हम आगे बढ़ गए |
मदुरै की यात्रा मेरे लिए वास्तुकला का पर्याय बन गयी है |माता से अपने भावी जीवन और उद्देश्यों की मंगल कामना करते हुए हम आगे बढ़ गए |

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