जीवन का सत्य जीवन रहते रहते ही मोक्ष की प्राप्ति है|पर मोक्ष की कल्पना में न जाने कितने जीवन मनुष्य पार कर जाता है|आखिर मोक्ष का मतलब क्या है ?शरीर का मोक्ष या आत्मा का ?आज से 17 साल पहले जब मै अपनी असाध्य सी स्थिति से जूझ रही थी तब मन में अनगिनत सवाल कौंध रहे थे|1995 में मै अचानक बीमार पड़ गई थी |मेडिकल साईंस फेल हो चूका था |डॉ .समझ नहीं पा रहे थे की मुझे हुआ क्या है ?मै दिन रात यही प्रार्थना करती की यदि मै आज डॉ के पास जाऊ तो कम से कम रोग क्या है ?ये बता दे,इलाज बाद में देखा जाएगा|पर सब तरफ असफलता पाने के बाद १९९८ मै सपरिवार केरल चली गई वहा कई डाक्टरों को दिखाने के बाद भी शुन्य परिणाम सब को निराश करा देने वाला था|मै केवल ईश्वर से अपनी मृत्यु की कामना करने लगी थी |तभी मामा जी ने एक बहुत बड़े नम्बूदरी (पुजारी )का पता बताया ,हम इन सब धार्मिक परम्पराओ को मानते जरुर थे पर इस प्रकार सामना पहली बार होना था |वहा पहुची तो अपने सामने एक अधेड़ लेकिन दिव्या चेहरे वाले व्यक्ति को सामने खड़ा पाई उन्होंने मुझ पर किसी ब्रम्ह राक्षसी का दोष बताया और विष्णु होम की सलाह दी |जीवन में पहली बार मै अपने साथ की इस विषम परिस्थियों से जूझ रही थी उस पर इस प्रकार का दोष समझ नहीं आ रहा था |फिर भी किसी तरह इस प्रकार की असाध्य सी स्थिति से निजात पाने के लिए कुछ भी करना पड़े करेगे, जैसी स्थिति बन गई थी |मुझे इन सब बातो पर यकीं नहीं था मैंने पूजा पाठसे इंकार कर दिया और किसी डॉ. को दिखाने की बात पर जोर देने लगी |पर उस समय की स्थिति हम सब के लिए बहुत ही कठिन था दिन ब दिन मेरी बिगडती हालत और इस प्रकार की क्रियाये मेरे लिए और भी निराशा की ओर धकेलते जा रही थी |सब की सलाह के बाद मै विष्णु होम के लिए तैयार हो गई |पापा ने कहा हो सकता है इस होम से तू ठीक न हो उस ब्रम्ह राक्षसी को मोक्ष मिल जाये |मेरे लिए ये सब अंध विश्वास को बढ़ावा देने वाली बात थी फिर भी मै यह सोच कर बैठ गई की हो सकता है मुझे अपने रोग का पता चल जाए और मै २४ घंटे रहने वाले चक्कर से मुक्त हो जाउ|तीन घंटे तक पूजा चलता रहा |विष्णु होम के लिए त्रिवेंद्रम से कमल फुल लाया गया था |मैंने जीवन में इतनी बड़ी पूजा नहीं देखि थी| एक चांदी के पत्र पर स्त्री की आकृति बनी हुई थी |पूजा के तुरंत बाद हमे किसी विष्णु क्षेत्र जा कर उसे विसर्जित करना था |शर्त ये था की पूजा से उठते ही हमे कही रुकना नहीं इसे लेकर विष्णु क्षेत्र में विसर्जित करना था |हमें समझ नहीं आ रहा था की कहा जाये ?मामा ने "वर्कला "जाने की सलाह दिए | "वर्कला "त्रिवेंद्रम से 35 कि मी उत्तर में केरल के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है |जिस तरह उत्तर में "गया जी "है उसी प्रकार दक्षिण में वर्कला मोक्ष स्थली माना गया है |मृत आत्मा को शांति एवं मोक्ष प्रदान करने के लिए लोग यहाँ समुन्द्र स्थली में पिंड दान कर स्नान ,ध्यान ,दान कर मृत आत्मा को शांति प्रदान करने कि मंगल कामना करते है |हम भी गंतव्य कि और चल पड़े |मेरा पूरा ध्यान पेटी पर था जिसे पुजारी ने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से एक केले के पत्ते में बांध रखा था |मै मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि आप जो भी है pleas मुझे क्या हुआ है ?ये जरुर बता जाना ताकि मै इस व्यू से निकल जाउ और अपनी पढाई पूरी कर सकू |ये मेरे जीवन का बहुत ही कठिन दौर था |
रात के २ बजे बस था हम गाड़ी का इंतजार करते बस के इन्तजार में बैठे रहे |मै किसी को अपनी हालत व्यक्त नहीं कर पा रही थी ,मम्मी पापा कि परेशानी भी बढाना नहीं चाहती थी |मन ही मन उस प्रतिमा से ही बात कर रही थी |और उससे कहे जा रही थी कि शायद मेरा कर्ज हो मै "तुम्हे मुक्त कर दुगी तुम मुझे मुक्त कर देना " इन्सान तो इन्सान वायवी शक्तिया भी क्या मुक्त होना चाहती है ?पता नहीं कितने अनगिनत सवाल मन में कौंध रहे थे ,और पता नहीं कब रात से सुबह हो गया |सुबह -सुबह हम वर्कला पहुच गये |समुन्द्र का इतना सुरम्य वातावरण मेरे सारे कष्टों से मुझे एक पल के लिए मुक्त कर दिया हो ?पर मन में अजीब सी उदासी थी मेरे कष्टों को मै जितना स्वजनों से व्यक्त नहीं कर पाई थी वही मै रात भर एक अव्यक्त सूक्ष्म शक्ति से बात कर रही थी जो देह से परे देह की पीड़ा झेल रही हो |और उसे विसर्जित करने का गम भी था पर बात यहाँ "मोक्ष "की थी मुक्ति की थी कही न कही हम अपने कष्टों से मुक्त होने के लिए "मोक्ष "की कल्पना कर बैठते है जहाँ शरीर का नहीं आत्मा का विसर्जन चाह बैठते है |
वर्कला यहाँ विष्णु के श्री जनार्दन स्वरुप का विग्रह मंदिर में स्थापित है |केरल कि कला और वास्तु कला का उत्कृष्ट नमूना यहाँ देखने को मिलता है |वृत्ताकार गर्भगृह और कोणाकार गुम्बज तांबे का बना हुआ है चारो ओर चौकोर मंडप जिसकी छत पर काठ की प्रतिमाये बनी हुई है |मै मंदिर के अहाते पर पहुची तो अजीब सी शांति और चारो तरफ का वातावरण बहुत ही सुन्दर जान पड़ रहा था |भगवान् जनार्दन के तीनो हाथो में शंख चक्र और गदा था साथ ही चौथा हाथ एक विशेष मुद्रा में प्रदर्शित था |जो शायद संसार के कल्याण और मोक्ष के लिए उठे हो |कहां जाता है इस प्रतिमा को सागर से किसी मछुवारे ने पाया था जिसे मंदिर में स्थापित किया गया |भगवान् जनार्दन के दर्शन से पहले हमने ब्रम्ह तीर्थ में स्नान किया पूजा अर्चना कर ब्रम्ह राक्षसी जो मेरे लिए एक साधारण मनुष्य से भी बढ़ कर हो गयी थी उसे भगवान् विष्णु के श्री चरणों में समर्पित कर मुझे अपार शांति मिल गया हो |आज इस घटना को घटे कई वर्ष हो गये पर "वर्कला "की यह यात्रा मेरे लिए अविश्मर्निय है |वहा से लौटने के बाद मुझे अपनी असाध्य से रोग का पता चला एक छोटी सी दुर्घटना में मेरे सर पर रक्त का संचार कम हो रहा था जो गहन चिकत्सा के बाद ठीक हो गया और आज मै वैदिक शास्त्र ,आयुर्वेद ,एवं वास्तु कला के रोमांचकारी विषयों के साथ अपने कार्य क्षेत्र के साथ आप सब के साथ जीवन के इस सफ़र में अपनी यात्रा तय कर रही हु |




