गुरुवायुर केरल का सर्वाधिक पवित्र मंदिर ,कहा जाता है द्वापर युग में द्वारका जी में अवस्थित गुरु और वायु के रूप में प्रतिस्थापित प्रतिमा यहाँ स्थापित है |सुदर्शन चक्रधारी नारायण के स्वरुप में यह प्रतिमा प्राणीमात्र के लिए यहाँ विराजमान है |जिनके वाम हस्त में शंख ,दक्षिण हस्त में चक्र और दोनों हस्त में गदा और कमल पुष्प है |भगवान् श्री नारायण की यह प्रतिमा बाल युवा और वृद्ध रूप में दर्शनीय है |केरल के प्रजागण की विशेष आस्था इस मंदिर से जुडी हुई है |मेरे लिए भी यह मंदिर अपने आप में साक्षात् जमीं पर देवालय है |जब भी मै अपने परिवार के साथ यहाँ आती हूँ तो पहले यहाँ आ कर भगवान् गुरुवायुर के दर्शन के बाद ही आगे की ओर बढती हूँ |
मै जब पहली बार गुरुवायुर गई तो मेरी उम्र 12 वर्ष ही थी |बचपन से परिवार का वातावरण पूजापाठ का रहा था इसलिए भगवान् पर मेरी आस्था थी पर मै प्रत्यक्ष देव शिव को ही मानती थी |हिन्दू संस्कृति में देवी-देवताओ की भरमार सी है कोई कृष्ण भक्त है तो कोई शिव भक्त या फिर देवी उपासक |पर मेरी भक्ति केवल शिव जी तक ही निहित रही थी |सुबह स्नान के बाद पास के ही शिव मंदिर जा कर पूजा कर के ही जलपान ग्रहण करना मेरी दिनचर्या की शुरुवात रहती |अन्य धार्मिक स्थल मेरे लिए केवल सैर सपाटे तक ही प्रिय रहता |पापा शुरू से ही धार्मिक स्थलों और पर्यटन के शौकीन थे इस लिए हर वर्ष गर्मियो को छुट्टियो में वे हमें कही न कही अवश्य ले जाते ,इस बार की केरल यात्रा में पापा ने पहले ही कह रखा था की मंदिर की पूजा सुबह 3 -4 बजे सुबह से ही शुरू हो जाती है इसलिए वहा पहुच कर सब समय में उठ कर दर्शन के लिए तैयार रहे |गुरुवायुर मंदिर के पास ही के एक होटल में हमने रूम ले रखा था ताकि समय से उठ कर हम भगवान के दर्शन कर सके |मै इस लम्बी यात्रा से काफी थकी हुई थी इसलिए अर्धरात्रि को उठ कर नहाने का मेरा जरा भी मन नहीं था |सब 2 बजे रात से ही उठ के तैयारी में लग गये |थकान के मारे मेरी आँख ही नहीं खुल रही थी |तभी पता नहीं सपना था या सच ?पुरे कमरे में सन्नाटा स छा गया |चारो तरफ धुंध छा गया हो अष्टगंध की खुशबु से पूरा कमरा महकने लगा |अचानक दरवाजा खुला और एक सुन्दर स बालक मेरे सिरहाने आया और बोला "चलो उठो मेरे दर्शन नहीं करना ?"ये सुन कर मेरी आंखे खुल गई चारो तरफ अँधेरा था सब नहा कर तैयार हो कर टेरिस में मेरे उठने का इन्तजार कर रहे थे |मेरे कानो में बार बार वही आवाज गूंज रहा था |तैयार हो कर मै मंदिर के प्राग्णन में पहुच गई |श्री हरी के मंत्रो से सारा वातावरण गूंज रहा था मेरे अन्दर अपार शांति और श्रद्धा उमड़ रही थी |आँखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे |संसार के सच से अनभिज्ञ मै , मेरी छोटी सी दुनिया में भगवान् गुरुवायुर को भी शामिल कर दी थी |भगवान् के दर्शन पा कर मै स्वयं को धन्य मान रही थी उस समय ये मेरे बचपन की यादे रही है पर आज मै इश्वरी सत्ता के आयाम को बखूबी समझ सकती हूँ |मंदिर में भीमकाय देवताओ एवं ऋषि -मुनियों की मुर्तिया मुझे अध्यात्म और अथाह ज्ञान के भंडार की प्रेरणा देते है |गुरु के रूप में प्राणरूपी वायु के वेग -प्रवेग को मै आज समझ सकती हु |सक्षात श्री नारायण की दिव्यता को महससू कर सकती हूँ |
केरल की यह दिव्या स्थली स्वयं में नगण्य है |कार्तिक महीने की एकादशी में यहाँ मंदिर में विशेष उत्सव मनाया जाता है |मंदिर में बाल भोज एवं वैवाहिक संस्कार की विशेषता है |कहा जाता है एक गरिए का मरीज यहाँ भक्त बन कर गाया करता था जो इश्वर की असीम कृपा से रोग मुक्त हो गया अतः यह विश्वास किया जाता है की यहाँ प्रार्थना करने पर अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है |
गुरुवायुर का इतिहास :
कहां जाता है श्री कृष्ण ने अपने परम मित्र उद्धव को एक बार गुरु वृहस्पति के पास अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश भेजा की समुन्द्र द्वारका पूरी को डूबा दे इसके पूर्व उनके पिता वासुदेव और माता देवकी जिस मूर्ति की पूजा किया करते उसे पवित्र स्थान में प्रतिष्ठित कर देवे|भगवान् ने उद्धव को बताया की यह प्रतिमा साधारण नहीं है कालांतर में यह प्रतिमा कलयुग में अपने भक्तो के लिए कल्यानप्रद सिद्ध होगी |यह सन्देश पा कर गुरु वृहस्पति द्वारिका गये किन्तु उस समय तक द्वारिका जलमग्न हो चूका था |उन्होंने अपने शिष्य वायु के सहायता से उस विग्रह को जल से निकाला और इसे सुरक्षित स्थान में प्रतिष्ठित करने के लिए इधर उधर भटकने लगे |पहले जहाँ यह मूर्ति प्रतिष्ठित थी उस समय वहां कमलपुष्पो से युक्त मनोरम झील थी जिसमे शिव जी और माता पार्वती जलक्रीडा किया करते जो इस अत्यंत पवित्र मूर्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे |वृहस्पति जी वहा पहुचे और शिव आज्ञा से वायु की सहायता से मूर्ति को यथा स्थान स्थापित किया तभी से उस स्थान का नाम "गुरुवायुर "पड़ा |मंदिर का निर्माण देवताओ और विश्वकर्मा द्वारा किया गया है यहाँ की कला अत्यंत उत्कृष्ट तथा मानषोत्तर कौसल युक्त है |
मूर्ति का इतिहास :
भगवान् विष्णु ने सर्वप्रथम अपनी यह साक्षात् मूर्ति ब्रम्हा जी को उस समय दी जब वह सृष्टि का निर्माण कर रहे थे ,उस समय स्वयंभू मन्वंतर प्रजापति "सुतपा "और उनकी पत्नी पृश्नी ने पुत्र प्राप्ति के लिए ब्रम्हा जी की अराधना की जिसे ब्रम्हा जी ने प्रसन्न हो कर उने प्रदान किया और उसकी उपासना का आदेश दिया |भगवान ने प्रकट हो कर पुत्र रूप में जन्म लेने का वचन दे कर अन्तर ध्यान हो गये |उसके पश्चात् पृथ्वीगर्भ के रूप में अवतरित हुए | दुसरे जन्म में सुतपा कश्यप तथा पृश्नी अदिति बनी |उस समय भगवान् "वामन "रूप में अवतरित हुए तीसरे जन्म में सुतपा "वासुदेव "और पृश्नी "देवकी "बनी तब भगवान् श्री कृष्ण ने उनके गर्भ से जन्म लिया |यह मूर्ति "धौम्य "ऋषि ने वासुदेव को दिया था जिसे द्वारिका में प्रतिष्ठित किया गया और उसकी पूजा अर्चना की थी ||
गुरुवायुर का इतिहास :
कहां जाता है श्री कृष्ण ने अपने परम मित्र उद्धव को एक बार गुरु वृहस्पति के पास अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश भेजा की समुन्द्र द्वारका पूरी को डूबा दे इसके पूर्व उनके पिता वासुदेव और माता देवकी जिस मूर्ति की पूजा किया करते उसे पवित्र स्थान में प्रतिष्ठित कर देवे|भगवान् ने उद्धव को बताया की यह प्रतिमा साधारण नहीं है कालांतर में यह प्रतिमा कलयुग में अपने भक्तो के लिए कल्यानप्रद सिद्ध होगी |यह सन्देश पा कर गुरु वृहस्पति द्वारिका गये किन्तु उस समय तक द्वारिका जलमग्न हो चूका था |उन्होंने अपने शिष्य वायु के सहायता से उस विग्रह को जल से निकाला और इसे सुरक्षित स्थान में प्रतिष्ठित करने के लिए इधर उधर भटकने लगे |पहले जहाँ यह मूर्ति प्रतिष्ठित थी उस समय वहां कमलपुष्पो से युक्त मनोरम झील थी जिसमे शिव जी और माता पार्वती जलक्रीडा किया करते जो इस अत्यंत पवित्र मूर्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे |वृहस्पति जी वहा पहुचे और शिव आज्ञा से वायु की सहायता से मूर्ति को यथा स्थान स्थापित किया तभी से उस स्थान का नाम "गुरुवायुर "पड़ा |मंदिर का निर्माण देवताओ और विश्वकर्मा द्वारा किया गया है यहाँ की कला अत्यंत उत्कृष्ट तथा मानषोत्तर कौसल युक्त है |
मूर्ति का इतिहास :
भगवान् विष्णु ने सर्वप्रथम अपनी यह साक्षात् मूर्ति ब्रम्हा जी को उस समय दी जब वह सृष्टि का निर्माण कर रहे थे ,उस समय स्वयंभू मन्वंतर प्रजापति "सुतपा "और उनकी पत्नी पृश्नी ने पुत्र प्राप्ति के लिए ब्रम्हा जी की अराधना की जिसे ब्रम्हा जी ने प्रसन्न हो कर उने प्रदान किया और उसकी उपासना का आदेश दिया |भगवान ने प्रकट हो कर पुत्र रूप में जन्म लेने का वचन दे कर अन्तर ध्यान हो गये |उसके पश्चात् पृथ्वीगर्भ के रूप में अवतरित हुए | दुसरे जन्म में सुतपा कश्यप तथा पृश्नी अदिति बनी |उस समय भगवान् "वामन "रूप में अवतरित हुए तीसरे जन्म में सुतपा "वासुदेव "और पृश्नी "देवकी "बनी तब भगवान् श्री कृष्ण ने उनके गर्भ से जन्म लिया |यह मूर्ति "धौम्य "ऋषि ने वासुदेव को दिया था जिसे द्वारिका में प्रतिष्ठित किया गया और उसकी पूजा अर्चना की थी ||






