मंगलवार, 17 जनवरी 2012

2010वायनाड










१९ जनवरी २०१० को मेरे जीवन की एक नई यात्रा शुरू होने वाली थी ,व्यवस्तम दिनचर्या और रोज की आपाधापी के बीच केरल की यात्रा का प्रोग्राम मेरे लिए पुनः एक नई उत्साह और शुकून देने वाला साबित हुआ |जीवन में कई विषमताए है ,कुछ घटनाक्रम ऐसे होते है जो मन को काफी व्यथित कर देते है|सत्य तो यह है की मनुष्य अपने गम से कम अपने आसपास के वातावरण से ज्यादा दुखी रहता है|ऐसी स्थिति में स्थान परिवर्तन या पर्यटन स्थल की सैर शारीरिक सुख से अधिक मानसिक सुकून दे जाता है|जीवन के प्रति एक नया आयाम ,एक जागृती पुनःजीवन को जीने की कला सीखा जाता है |

वायनाड की यात्रा मेरे लिए एक नए वातावरण को जन्म देने जा रहा था |मै यह यात्रा शायद कभी न भूलू क्योकि इस दौरान मै जीवन के बहुत ही कठिन दौर और मानसिक अवसाद से गुजर रही थी |एक ज्योतिष होने के नाते भुत ,भविष्य और वर्तमान का अध्यन मेरा शौक रहा था |प्रत्यक्ष रूप से इंसानी फितूर के रूप में ग्रह कैसे एक दुसरे को हताहत करते है मैंने इसी दौरान जाना |मैंने अपने छोटे से जीवन काल में लोगो की कई समस्याओ से अवगत हुई कई मामले दिल को दहला देने वाले होते वही मै सभी परिवेश से हट के वायनाड जाने का फैसला की जो सही और सार्थक रहा |
"वायनाड " केरल के उत्तर पूर्व में बसा एक मनोरम पर्यटन स्थल है| प्राकृतिक सौन्दर्य से सुशोभित "वायनाड"का सोंदर्य देखते ही बनता है|मैंने जीवन में पहाडियों से घिरा इतना मनोरम स्थान कभी नहीं देखा था |९ कर्व (घाटी)को पार कर पहाड़ो में बसा "वायनाड"मानो धरती में स्वर्ग का उपवन हो |चारो तरफ हरियाली और रास्ता |मेरी भाभी वायनाड की रहने वाली है |इसलिए भी यह जगह मेरे लिए महत्वपूर्ण है इसी बहाने यहाँ की प्रकृति से भी मेरा रिश्ता बन गया है |यहाँ का मौसम हमेशा ठंडक लिए रहता है |चारो तरफ चाय के बागान है|मानो  धरती ने हरी रेशमी चादर ओढ़ रखी हो | ..............क्रमश 

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