" त्र्यम्बकेश्वर"11agust2013
मेरी यात्रा के इस श्रृखला में " त्र्यम्बकेश्वर"की यात्रा मेरी अभी तक की यात्राओ में सबसे ज्यादा रोमांचक रही है ११ अगस्त २०१३ को मैंने भगवान् शंकर के १० ज्योतिर्लिंग जो साक्षात् भगवान् शिव का शरीर माना जाता है के दर्शन किये |बादलो की धुंध से ढका हुआ ब्रम्हगिरि पर्वत मानो आसमान को नीचे उतार लाया हो यहाँ का अद्भुत दृश्य अपने आप में सौन्दर्य से भरा हुआ है पानी की बूंदाबांदी ने इस दिव्या स्थली को मानो और भी सुन्दर बना दिया हो ?मुझे केदार में हुई घटना का काफी दुःख था सच बताऊ तो भगवान से मै काफी नाराज थी यहाँ आने का प्रोग्राम अचानक बन गया था ,मुझे भगवान् के प्रति उदासीनता सी थी और अपने माता पिता की चिंता ?मै केवल इतना ही सोच कर यहाँ आई थी की रोज रोज की व्यवस्तम दिनचर्या से थोडा राहत मिल जाएगा और मम्मी -पापा को भगवान् का दर्शन मिल जायेगे |पर यहाँ आने के बाद भगवान् शिव के प्रति मेरी सारी नाराजगी जाती रही |यहाँ पहुच कर मैंने सपरिवार मंदिर की प्रदक्षिणा की और भगवान के त्रयम्बक स्वरूप के दर्शन किये |अपने पूर्वजो को तर्पण दे कर मेरे स्वजन भी प्रसन्नचित और शांत दिखे | यह मन्दिर महाराष्ट्र-प्रांत के नासिक जिले में है |ब्रह्म गिरि नामक पर्वत जिसका सौन्दर्य देखते ही बनता है यही से गोदावरी नदी का उद्गम हुआ है। गोदावरी के उद्गम-स्थान के समीप त्रयम्बकेश्वर-भगवान शिव जी का मंदिर है |कहा जाता है गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भगवान शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हुए। मंदिर के अंदर एक छोटे से गङ्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतिक माने जाते हैं। गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर काले पत्थरों से बना है। मंदिर का स्थापत्य अद्भुत है। इस मंदिर के पास ही कुशावर्ती तीर्थ है जहा स्नान ध्यान कर लोग अपने पूर्वजो को तर्पण देते है |‘कुशावर्त तीर्थ की जन्मकथा काफी रोचक है। कहते हैं ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बाँध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा लबालब पानी रहता है। इस कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। कुंभ स्नान के समय शैव अखाड़े इसी कुंड में शाही स्नान करते हैं।’यहाँ कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा संपन्न होती है।
