मंगलवार, 17 जनवरी 2012

2010वायनाड










१९ जनवरी २०१० को मेरे जीवन की एक नई यात्रा शुरू होने वाली थी ,व्यवस्तम दिनचर्या और रोज की आपाधापी के बीच केरल की यात्रा का प्रोग्राम मेरे लिए पुनः एक नई उत्साह और शुकून देने वाला साबित हुआ |जीवन में कई विषमताए है ,कुछ घटनाक्रम ऐसे होते है जो मन को काफी व्यथित कर देते है|सत्य तो यह है की मनुष्य अपने गम से कम अपने आसपास के वातावरण से ज्यादा दुखी रहता है|ऐसी स्थिति में स्थान परिवर्तन या पर्यटन स्थल की सैर शारीरिक सुख से अधिक मानसिक सुकून दे जाता है|जीवन के प्रति एक नया आयाम ,एक जागृती पुनःजीवन को जीने की कला सीखा जाता है |

वायनाड की यात्रा मेरे लिए एक नए वातावरण को जन्म देने जा रहा था |मै यह यात्रा शायद कभी न भूलू क्योकि इस दौरान मै जीवन के बहुत ही कठिन दौर और मानसिक अवसाद से गुजर रही थी |एक ज्योतिष होने के नाते भुत ,भविष्य और वर्तमान का अध्यन मेरा शौक रहा था |प्रत्यक्ष रूप से इंसानी फितूर के रूप में ग्रह कैसे एक दुसरे को हताहत करते है मैंने इसी दौरान जाना |मैंने अपने छोटे से जीवन काल में लोगो की कई समस्याओ से अवगत हुई कई मामले दिल को दहला देने वाले होते वही मै सभी परिवेश से हट के वायनाड जाने का फैसला की जो सही और सार्थक रहा |
"वायनाड " केरल के उत्तर पूर्व में बसा एक मनोरम पर्यटन स्थल है| प्राकृतिक सौन्दर्य से सुशोभित "वायनाड"का सोंदर्य देखते ही बनता है|मैंने जीवन में पहाडियों से घिरा इतना मनोरम स्थान कभी नहीं देखा था |९ कर्व (घाटी)को पार कर पहाड़ो में बसा "वायनाड"मानो धरती में स्वर्ग का उपवन हो |चारो तरफ हरियाली और रास्ता |मेरी भाभी वायनाड की रहने वाली है |इसलिए भी यह जगह मेरे लिए महत्वपूर्ण है इसी बहाने यहाँ की प्रकृति से भी मेरा रिश्ता बन गया है |यहाँ का मौसम हमेशा ठंडक लिए रहता है |चारो तरफ चाय के बागान है|मानो  धरती ने हरी रेशमी चादर ओढ़ रखी हो | ..............क्रमश 

गुरुवायुर







 गुरुवायुर केरल का सर्वाधिक पवित्र मंदिर ,कहा जाता है द्वापर युग में द्वारका जी में अवस्थित गुरु और वायु के रूप में प्रतिस्थापित प्रतिमा यहाँ स्थापित है |सुदर्शन चक्रधारी नारायण के स्वरुप में यह प्रतिमा प्राणीमात्र के लिए यहाँ  विराजमान है |जिनके वाम हस्त में शंख ,दक्षिण हस्त में चक्र और दोनों हस्त में गदा और कमल पुष्प है |भगवान् श्री नारायण की यह प्रतिमा बाल युवा और वृद्ध रूप में दर्शनीय है |केरल के प्रजागण की विशेष आस्था इस मंदिर से जुडी हुई है |मेरे लिए भी यह मंदिर अपने आप में साक्षात् जमीं पर देवालय है |जब भी मै अपने परिवार के साथ यहाँ आती हूँ तो पहले यहाँ आ कर भगवान् गुरुवायुर के दर्शन के बाद ही आगे की ओर बढती हूँ |
मै जब पहली बार गुरुवायुर गई तो मेरी उम्र 12 वर्ष ही थी |बचपन से परिवार का वातावरण पूजापाठ का रहा था इसलिए भगवान् पर मेरी आस्था थी पर मै प्रत्यक्ष देव शिव को ही मानती थी |हिन्दू संस्कृति में देवी-देवताओ की भरमार सी है कोई कृष्ण भक्त है तो कोई शिव भक्त या फिर देवी उपासक |पर मेरी भक्ति केवल शिव जी तक ही निहित रही थी |सुबह स्नान के बाद पास के ही शिव मंदिर जा कर पूजा कर के ही जलपान ग्रहण करना मेरी दिनचर्या की शुरुवात रहती |अन्य धार्मिक स्थल मेरे लिए केवल सैर सपाटे तक ही प्रिय रहता |पापा शुरू से ही धार्मिक स्थलों और पर्यटन के शौकीन थे इस लिए हर वर्ष गर्मियो को छुट्टियो में वे हमें कही न कही अवश्य  ले जाते ,इस बार की केरल यात्रा में पापा ने पहले ही कह रखा था की मंदिर की पूजा सुबह 3 -4 बजे सुबह से ही शुरू हो जाती है इसलिए वहा पहुच कर सब समय में उठ कर दर्शन के लिए तैयार रहे |गुरुवायुर मंदिर के पास ही के एक होटल में हमने रूम ले रखा था ताकि समय से उठ कर हम भगवान के दर्शन  कर सके |मै इस लम्बी यात्रा से काफी थकी हुई थी इसलिए अर्धरात्रि को उठ कर नहाने का मेरा जरा भी मन नहीं था |सब 2 बजे रात से ही उठ के तैयारी में लग गये |थकान के मारे मेरी आँख ही नहीं खुल रही थी |तभी पता नहीं सपना था या सच ?पुरे कमरे में सन्नाटा स छा गया |चारो तरफ धुंध छा गया हो अष्टगंध की खुशबु से पूरा कमरा महकने लगा |अचानक दरवाजा खुला और एक सुन्दर स बालक मेरे सिरहाने आया और बोला "चलो उठो मेरे दर्शन नहीं करना ?"ये सुन कर मेरी आंखे खुल गई चारो तरफ अँधेरा था सब नहा कर तैयार हो कर टेरिस में मेरे उठने का इन्तजार कर रहे थे |मेरे कानो में बार बार वही आवाज गूंज रहा था |तैयार हो कर मै मंदिर के प्राग्णन में पहुच गई |श्री हरी के मंत्रो से सारा वातावरण गूंज रहा था मेरे अन्दर अपार शांति और श्रद्धा उमड़ रही थी |आँखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे |संसार के सच से अनभिज्ञ मै , मेरी छोटी सी दुनिया में भगवान् गुरुवायुर को भी शामिल कर दी थी |भगवान् के दर्शन पा कर मै स्वयं को धन्य मान रही थी उस समय ये मेरे बचपन की यादे रही है पर आज मै इश्वरी सत्ता के आयाम को बखूबी समझ सकती हूँ |मंदिर में भीमकाय देवताओ एवं ऋषि -मुनियों की मुर्तिया मुझे अध्यात्म और अथाह ज्ञान के भंडार की प्रेरणा देते है |गुरु के रूप में प्राणरूपी  वायु के वेग -प्रवेग को मै आज समझ सकती हु |सक्षात श्री नारायण की दिव्यता को महससू कर सकती हूँ |
केरल की यह दिव्या स्थली स्वयं में नगण्य है |कार्तिक महीने की एकादशी में यहाँ मंदिर में विशेष उत्सव मनाया जाता है |मंदिर में बाल भोज एवं वैवाहिक संस्कार की विशेषता है |कहा जाता है एक गरिए का मरीज यहाँ भक्त बन कर गाया  करता था जो इश्वर की असीम कृपा से रोग मुक्त हो गया अतः यह विश्वास किया जाता है की यहाँ प्रार्थना करने पर अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है |



गुरुवायुर का इतिहास :


कहां जाता है श्री कृष्ण ने अपने परम मित्र उद्धव को एक बार गुरु वृहस्पति के पास अत्यंत महत्वपूर्ण सन्देश भेजा की समुन्द्र द्वारका पूरी को डूबा दे इसके पूर्व उनके पिता वासुदेव और माता देवकी जिस मूर्ति की पूजा किया करते उसे पवित्र स्थान में प्रतिष्ठित कर देवे|भगवान् ने उद्धव को बताया की यह प्रतिमा साधारण नहीं है कालांतर में यह प्रतिमा कलयुग में अपने भक्तो के लिए कल्यानप्रद सिद्ध होगी  |यह सन्देश पा कर गुरु वृहस्पति द्वारिका गये किन्तु उस समय तक द्वारिका जलमग्न हो चूका था |उन्होंने अपने शिष्य वायु के सहायता से उस विग्रह को जल से निकाला और इसे सुरक्षित स्थान में प्रतिष्ठित करने के लिए इधर उधर भटकने लगे |पहले जहाँ यह मूर्ति प्रतिष्ठित थी उस समय वहां कमलपुष्पो से युक्त मनोरम झील थी जिसमे शिव जी और माता पार्वती जलक्रीडा किया करते जो इस अत्यंत पवित्र मूर्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे |वृहस्पति जी वहा पहुचे और शिव आज्ञा से वायु की सहायता से मूर्ति को यथा स्थान स्थापित किया तभी से उस स्थान का नाम "गुरुवायुर "पड़ा |मंदिर का निर्माण देवताओ और विश्वकर्मा द्वारा किया गया है यहाँ की कला अत्यंत उत्कृष्ट तथा मानषोत्तर कौसल युक्त है |


मूर्ति का इतिहास :


भगवान् विष्णु ने सर्वप्रथम अपनी यह साक्षात् मूर्ति ब्रम्हा जी को उस समय दी जब वह सृष्टि का निर्माण कर रहे थे ,उस समय स्वयंभू मन्वंतर प्रजापति "सुतपा "और उनकी पत्नी पृश्नी ने पुत्र प्राप्ति के लिए ब्रम्हा जी की अराधना की जिसे ब्रम्हा जी ने प्रसन्न हो कर उने प्रदान किया और उसकी उपासना का आदेश दिया |भगवान ने प्रकट हो कर पुत्र रूप में जन्म लेने का वचन दे कर अन्तर ध्यान हो गये |उसके पश्चात् पृथ्वीगर्भ के रूप में अवतरित हुए | दुसरे जन्म में सुतपा कश्यप तथा पृश्नी अदिति बनी |उस समय भगवान् "वामन "रूप में अवतरित हुए तीसरे जन्म में सुतपा "वासुदेव "और पृश्नी "देवकी "बनी तब भगवान् श्री कृष्ण ने उनके गर्भ से जन्म लिया |यह मूर्ति "धौम्य "ऋषि ने वासुदेव को दिया था जिसे द्वारिका में प्रतिष्ठित किया गया  और उसकी पूजा अर्चना की थी ||

सोमवार, 16 जनवरी 2012

वर्कला (एक ब्रम्हा राक्षसी का मोक्ष)








जीवन का सत्य जीवन रहते रहते ही मोक्ष की प्राप्ति है|पर मोक्ष की कल्पना में न जाने कितने जीवन मनुष्य पार कर जाता है|आखिर मोक्ष का मतलब क्या है ?शरीर का मोक्ष या आत्मा का ?आज से 17  साल पहले जब  मै अपनी असाध्य सी स्थिति से जूझ रही थी तब मन में अनगिनत सवाल कौंध रहे थे|1995 में मै अचानक बीमार पड़ गई थी |मेडिकल साईंस फेल हो  चूका था |डॉ .समझ नहीं पा रहे थे की मुझे हुआ क्या है ?मै दिन रात यही प्रार्थना करती की यदि मै आज  डॉ के पास जाऊ तो कम से कम रोग क्या है ?ये बता दे,इलाज बाद में देखा जाएगा|पर सब तरफ असफलता पाने के बाद १९९८ मै सपरिवार केरल चली गई वहा कई डाक्टरों को दिखाने  के बाद भी शुन्य परिणाम सब को निराश करा देने वाला था|मै केवल ईश्वर से अपनी मृत्यु की कामना करने लगी थी |तभी मामा जी ने एक बहुत बड़े नम्बूदरी (पुजारी )का पता बताया ,हम इन सब धार्मिक परम्पराओ  को मानते जरुर थे पर इस प्रकार सामना पहली बार होना था |वहा पहुची तो अपने सामने एक अधेड़ लेकिन दिव्या चेहरे वाले  व्यक्ति को सामने खड़ा पाई उन्होंने  मुझ पर किसी ब्रम्ह राक्षसी का दोष बताया और विष्णु होम की सलाह दी |जीवन में पहली बार मै अपने साथ की इस विषम परिस्थियों से जूझ रही थी उस पर इस प्रकार का दोष समझ नहीं आ रहा था |फिर भी किसी तरह इस प्रकार की  असाध्य सी स्थिति से निजात पाने के लिए कुछ भी करना पड़े करेगे, जैसी स्थिति बन गई थी |मुझे इन सब बातो पर यकीं नहीं था मैंने पूजा पाठसे इंकार कर दिया और किसी डॉ. को दिखाने की बात पर जोर देने लगी |पर उस समय की स्थिति हम सब के लिए बहुत ही कठिन था दिन ब दिन मेरी बिगडती हालत और इस प्रकार की क्रियाये मेरे लिए और भी निराशा की ओर धकेलते जा रही थी |सब की सलाह के बाद मै विष्णु होम के लिए तैयार हो गई |पापा ने कहा हो सकता है इस होम से तू ठीक न हो उस ब्रम्ह राक्षसी को मोक्ष मिल जाये |मेरे लिए ये सब अंध विश्वास को बढ़ावा देने वाली बात थी फिर भी मै यह सोच कर बैठ गई की हो सकता है मुझे अपने रोग का पता चल जाए और मै २४ घंटे रहने वाले चक्कर से मुक्त हो जाउ|तीन घंटे तक पूजा चलता रहा |विष्णु होम के लिए त्रिवेंद्रम से कमल फुल लाया गया था |मैंने जीवन में इतनी बड़ी पूजा नहीं देखि थी| एक चांदी के पत्र पर स्त्री की आकृति बनी हुई थी |पूजा के तुरंत बाद हमे किसी विष्णु क्षेत्र जा कर उसे विसर्जित करना था |शर्त ये था की पूजा से उठते ही हमे कही रुकना नहीं इसे लेकर विष्णु क्षेत्र में विसर्जित करना था |हमें समझ नहीं आ रहा था की कहा जाये ?मामा ने "वर्कला "जाने की सलाह दिए | "वर्कला "त्रिवेंद्रम से 35 कि मी  उत्तर में केरल के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है |जिस तरह उत्तर में "गया जी "है उसी प्रकार दक्षिण में वर्कला मोक्ष स्थली माना गया है |मृत आत्मा को शांति एवं मोक्ष प्रदान करने के लिए लोग यहाँ समुन्द्र स्थली में पिंड दान कर स्नान ,ध्यान ,दान कर मृत आत्मा को शांति प्रदान करने कि मंगल कामना करते है |हम भी गंतव्य कि और चल पड़े |मेरा पूरा ध्यान पेटी पर था जिसे पुजारी ने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से एक केले के पत्ते में बांध रखा था |मै मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि आप जो भी है pleas मुझे क्या हुआ है ?ये जरुर बता जाना ताकि मै इस व्यू से निकल जाउ और अपनी पढाई पूरी कर सकू |ये मेरे जीवन का बहुत ही कठिन दौर था |
रात के २ बजे बस था हम गाड़ी का इंतजार करते बस के इन्तजार में बैठे रहे |मै किसी को अपनी हालत व्यक्त नहीं कर पा रही थी ,मम्मी पापा कि परेशानी भी बढाना नहीं चाहती थी |मन ही मन उस प्रतिमा से ही बात कर रही थी |और उससे कहे जा रही थी कि शायद मेरा कर्ज हो मै "तुम्हे मुक्त कर दुगी तुम मुझे मुक्त कर देना " इन्सान तो इन्सान वायवी शक्तिया भी क्या मुक्त होना चाहती है ?पता नहीं कितने अनगिनत सवाल मन में कौंध रहे थे ,और पता नहीं कब रात से  सुबह हो गया |सुबह -सुबह हम वर्कला पहुच गये  |समुन्द्र का इतना सुरम्य वातावरण मेरे सारे कष्टों से मुझे एक पल के लिए मुक्त कर दिया हो ?पर मन में अजीब सी उदासी थी मेरे कष्टों को मै जितना स्वजनों से व्यक्त नहीं कर पाई थी वही मै रात भर एक अव्यक्त सूक्ष्म शक्ति से बात कर रही थी  जो देह से परे देह की पीड़ा झेल रही हो |और उसे विसर्जित करने का गम भी था पर बात यहाँ "मोक्ष "की थी मुक्ति की थी कही न कही हम अपने कष्टों से मुक्त होने के लिए "मोक्ष "की कल्पना कर बैठते है जहाँ शरीर का नहीं आत्मा का विसर्जन चाह बैठते है |
वर्कला यहाँ विष्णु के श्री जनार्दन स्वरुप का विग्रह मंदिर में स्थापित है |केरल कि कला और वास्तु कला का उत्कृष्ट नमूना यहाँ देखने को मिलता है |वृत्ताकार गर्भगृह और कोणाकार गुम्बज तांबे का बना हुआ है चारो ओर चौकोर मंडप जिसकी छत पर काठ की प्रतिमाये बनी हुई है |मै मंदिर के अहाते पर पहुची तो अजीब सी शांति और चारो तरफ का वातावरण बहुत ही सुन्दर जान पड़ रहा था |भगवान्  जनार्दन के तीनो हाथो में शंख चक्र और गदा था साथ ही चौथा हाथ एक विशेष मुद्रा में प्रदर्शित था |जो शायद  संसार के कल्याण और मोक्ष के लिए उठे हो |कहां जाता है इस प्रतिमा को सागर से किसी मछुवारे ने पाया था जिसे मंदिर में स्थापित किया गया |भगवान् जनार्दन के दर्शन से पहले हमने ब्रम्ह तीर्थ में स्नान किया  पूजा अर्चना कर  ब्रम्ह राक्षसी जो मेरे लिए एक साधारण मनुष्य  से भी बढ़ कर हो गयी थी उसे भगवान् विष्णु के श्री चरणों में समर्पित कर मुझे अपार शांति मिल गया हो |आज इस घटना को घटे कई वर्ष हो गये पर "वर्कला "की यह यात्रा मेरे लिए अविश्मर्निय है |वहा से लौटने के बाद मुझे अपनी असाध्य से रोग का पता चला एक छोटी सी दुर्घटना में मेरे सर  पर रक्त का संचार कम हो रहा था जो गहन चिकत्सा के बाद ठीक हो गया और आज मै वैदिक शास्त्र ,आयुर्वेद ,एवं वास्तु कला के रोमांचकारी विषयों के साथ अपने कार्य क्षेत्र के साथ आप सब के साथ जीवन के इस सफ़र में अपनी यात्रा तय कर रही हु |

रविवार, 7 अगस्त 2011

जगननाथ पूरी


मेरी यात्रा के स्वर्णिम स्मरण में भगवान् जगननाथ पूरी की यात्रा भी शामिल है |१९८७ में मै बहुत छोटी थी मुझे याद है जीवन में यह दूसरी बार मै समुन्द्र के दर्शन कर रही थी |भगवान के प्रति मेरी आस्था केवल उतनी ही थी जितनी की मम्मी पापा को पूजा करते देखा किया करती थी |भगवान् जगननाथ "जिसके हाथ न पैर "केवल देख रहा है पर कुछ कर नहीं सकता |कलयुग में भगवान् ने अपनी आँखे लगभग  बंद कर दी है |केवल अवतार स्वरूप भगवान जगननाथ  दुनिया को देख रहे है और कह रहे हो "अपना हाथ जगननाथ "मै देख सकता हूँ और संबल भी दूंगा पर अपना काम तुम्हे स्वयं करना पड़ेगा |
मुझे आज भी वो दिन याद है पापा ने अचानक ही जगननाथपूरी  की यात्रा बना लिए थे | हमारे पारिवारिक मित्र और उनका परिवार भी हमारी इस यात्रा में शामिल थे |हमें नहीं मालूम था रथ यात्रा के पंद्रह दिन पहले ही भगवान् जगननाथ का मुख्य मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है |यात्रा जीप में होनी  थी , सफ़र काफी लम्बा था इसलिए संबलपुर हाल्ट करके आगे बढ़ना निर्धारित हुआ |बारिश का मौसम शुरू हो चूका था पर इतना बारिश मैंने जीवन में कभी नहीं देखा |निकलते तक सब अच्छा था अचानक घनघौर घटा झा गया इतनी तेज बारिश आंधी तूफ़ान के चलते सड़क तक दिख पाना मुश्किल हो गया था | जीवन में पहली बार बड़े बड़े वृक्षों  को गिरते देख रही थी मानो वो  इस यात्रा को रोकने के लिए अमादा हो रहे हो |यात्रामुहूर्त  का मुझे ज्ञान नहीं था पर मम्मी  पापा के मुख से सुन रही थी हमने यात्रा के लिए गलत समय का चयन किया |किसी तरह रात को हम संबलपुर पहुंचे और दुसरे दिन जगननाथ पूरी पहुँच गये |एक लार्ज में रुकने की व्यवस्था कर हम स्नान ध्यान कर मंदिर के प्रागणन पर पहुंचे अन्य छोटे छोटे मंदिरों का दर्शन कर हम मुख्या द्वार पर पहुचे तो पता चला की मंदिर का पट बंद है |हम सब को बहुत दुःख हुआ की इतनी कठिनाई से हम यहाँ तक पहुचे पर भगवान् श्रीजगननाथ के दर्शन का सौभाग्य हमे प्राप्त नहीं हुआ रस्ते भर की कठिनाइयाँ और रास्ता रोकते भीमकाय वृक्षों का गिरना ये सब  अप्रत्याशित था |
भगवान् श्री जगन्नाथ पूरी चार परम धामों में एक धाम माना  गया है |ऐसी मान्यता है की सतयुग में बदरीनाथ ,त्रेता में रामेश्वरम ,द्वापर में द्वारकापुरी ,और कलयुग में श्रीजगन्नाथ पूरी ही पावनकारी धाम है |  पहले यहाँ नीलांचल नामक पर्वत था और नीलमाधव की श्रीमूर्ति भी यहाँ इसी पर्वत में स्थापित थी |जिसकी देवता अराधना करते थे |यह पर्वत भिमी में चला गया और देवता मूर्ति अपने साथ ही ले गए |पर उनकी स्मृति में इस क्षेत्र को नीलांचल कहा  जाता है|श्री जगन्नाथ मंदिर पर लगा चक्र नीलच्छ्त्र कहलाता है |जहाँ तक यह चक्र दिखाई देता है वहा तक श्रीजगन्नाथ पूरी है |
इस क्षेत्र के अनेक नाम है |इसे श्रीक्षेत्र ,पुरुषोत्तमपूरी  और शंखक्षेत्र भी कहते है क्योकि इस पुरे पुण्य स्थल की आकृति शंख के समान है | शाक्त इसे उड्डीयन पीठ कहते है |कहा जाता है यहाँ सती माता का नाभि गिरा था |अब मै पुनः श्री जगन्नाथ पूरी के दर्शन को जा रही हूँ |विश्वास है भगवान् मेरी इस यात्रा को सफल करेगे .............क्रमश :



बुधवार, 11 नवंबर 2009

"तिरुपति "

भगवान् वेंकटेश्वर स्वामी ,कलयुग के अवतार ,श्री निवासन (बालाजी )भगवान् को मेरा शत -शत नमन है मद्रास से १५१किलो मी की दुरी पर सप्तगिरियों के बीच तिरुमलै पर्वत पर स्थित भगवान् वेंकटेश्वर का मन्दिर अद्भुत है यहाँ मै तीसरी बार आ रही थी पहली बार आई तब बहुत छोटी थी ,एक धुंधली याद बस है ,दूसरी बार आई तब भारी भीड़ होने के कारण भगवान् बालाजी के दर्शन ठीक से नही हो सके थे इस बार मानो भगवान् ने स्वयं मुझे बुलाया हो ऐसा जान पड़ रहा था चारो तरफ़ ठण्ड और कोहरों के बीच यहाँ का मौसम अलौकिक जान पड़ रहा था
मानव जीवन आज तक अपने होने का ऋण ही तो चुकता आया है मैंने भगवान् वेंकटेश्वर के सामने ख़ुद को ही समर्पित कर दिया है मेरे आँख से आंसू थम ही नही रहे थे ,एक अपूर्व शान्ति मानो मेरा कवच बन गयी हो मै इस दिव्या मन्दिर आ कर अपने को हमेशा धन्य मानती हु
अपने परिवार के साथ इस मनोरम यात्रा में मैंने जीवन के विभिन्न आयाम देखे वर्तमान समय से कही ज्यादा समृद्धि मुझे प्राचीन राजाओ की श्रद्धा और कलाकौसल से ज्ञात हुआ है आज चाह कर भी इसकी पुनरावृति नही हो सकती
बालाजी मन्दिर तीन परकोटो से घिरा हुआ है जिसमे कई मंडपम है इन पर गोपुरम बने हुए है जिन पर स्वर्ण कलश स्थापित है स्वर्ण द्वार के सामने "तिरुमहामंडपम "है मन्दिर के सिंहस्थद्वार को "पड़ीकावली "कहते है इस द्वार के भीतर भगवान् वेंकटेश्वर के भक्त नरेशों और उनकी रानी के विग्रह स्थापित है
प्रथम व् द्वितीय द्वार के मध्य की प्रदिक्ष्ना को "सम्पिंग"प्रदिक्ष्ना कहते है इस पर विरज नामक कुआ है कहा जाता है श्री बालाजी के पाँव के नीचे से विरजा नामक नदी निकलती है जिसका पानी इस कूप में आता है इसी प्रदिक्ष्ना में "पुष्प कूप "है जिस में बालाजी को चढाये गए तुलसी दल को बाटने के बजाय इस पर डाला जाता है
द्वितीय द्वार पर जो प्रदिक्ष्ना है उसे "विमान "प्रदिक्ष्ना कहते है इसमे योग नुर्शिंग ,श्री वरदराज ,श्रीरामानुजाचार्या ,गरुड़ आदि के विग्रह स्थापित है
तीसरे द्वार के भीतर गर्भगृह में एक प्रदिक्ष्ना है जो बैकुण्डप्रदिक्ष्ना के नाम से जाना जाता है यह केवल पौष शुक्ल एकादशी को ही खुलता है भगवान् बालाजी के मन्दिर के सामने स्वर्णमंडित स्तम्भ है तथा द्वार पर ही जय-विजय की मुर्तिया है इसी मंडप के एक ओर "हुंडी "नामक हौज है जिस पर दर्शनार्थी बालाजी को चढ़ने वाला कर अर्थात द्रव्य आभूषण आदि चढाते है
जगमोहन से चौथे द्वार को पार करके पाँचवे द्वार के भीतर भगवान् वेंकटेश्वर स्वामी का ७ फुट ऊँचा श्याम वर्णीय प्रतिमा स्थापित है भगवान् अपने हाथ में शंख ,पद्म ,चक्र ,गदा लिए खड़े है भगवान् के दोनों ओर श्रीदेवी और भूदेवी की प्रतिमा स्थापित है भगवान् के विग्रह पर भीमसेनी कर्पुर का तिलक किया जाता है जो प्रसाद के रूप में बिकता है इस विग्रह के सामने खड़ी हो कर मै साक्षात् श्री हरी के सामने खड़ा महसूस कर रही थी वेंकटाचल पर्वत पर ही अनेक तीर्थ-पांडव तीर्थ ,पापनाशनं तीर्थ ,आकाशगंगा ,जाबालीतीर्थ ,बैकुण्ड तीर्थ ,चक्रतीर्थ ,कुमार्धारा ,रामकृष्ण तीर्थ,घौनतीर्थ ,आदि है जो दर्शनीय है यहाँ की यात्रा कहने से नही वहा जाने से ही ज्ञात होता है इस दिव्य स्थली की यात्रा का सौभाग्य हर किसी को मिले यही  भगवान् वेंकटेश्वर स्वामी से प्रार्थना है

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

"पलनी "




"पलनी"मदुरै से ११९ किलो.मी .की दुरी में 'तिरुवाविन्न्कूडी मन्दिर '(पहाड़ की तराई )पर बसा दक्षिण भारत का सबसे लोकप्रियमन्दिर है |सन २००१मे ही यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे मनोरम यात्रा में से एक रहा है |पलनी पहुच कर मानो मै एक ऐसे स्थान पर पहुच गई थी जहाँ भगवान् सुब्रमनियम (कार्तिक )का वीतराग स्वयं ढाल बन कर मानव जीवन को दृढ़ता प्रदान कर रहा हो |भगवान् कार्तिके जिन्होंने सांसारिक सुखो का त्याग कर वीतरागी के रूप मे यहाँ विराजमान है |पौराणिक कथाओ के अनुसार एक बार शिवजी ने एक असाधारण फल दिखाते हुए गणेश जी और कार्तिक भगवान् को कहा की जो भी पृथ्वी का चक्कर लगा कर उनके पास आता है ,तो वह यह अद्भुत फल उसे देगे |कार्तिक जी मयूर पर आरूढ़ हो कर पृथ्वी भ्रमण को निकल पड़े ,ही गणपति जी ने अपनी कुशाग्र बुद्धि का प्रयोग कर माता -पिता का चक्कर लगा कर पृथ्वी भ्रमण की क्रिया सम्पान किया जिससे वे फल के अधिकारी हुए |जब भगवान् कार्तिके वापस आए तो यह देख क्रोधित हुए और हाथ मे एक दंड ले कर कौपीनधारी हो कर शिवगिरी (पलनी )पहुच गए और वहा अपना स्थान बना लिया |यहाँ भगवान् नवपाषण से निर्मित विग्रह के रूप मे स्थापित है |जिन्हें कुछ निश्चित अनुपात मे मिश्रित किया गया है |यह परिणामी मोम की तरह है कहते इस प्रतिमा के संपर्क मे आने वाले सभी पदार्थो से रोग शमन होता है |इस प्रतिमा को प्रतिदिन विभिन्न पदार्थो से नहलाया जाता है |जो प्रसाद के रूप मे वितरित किया जाता है |
भगवान् कार्तिक की प्रतिमा उत्थान मुद्रा मे प्रतिष्ठित है |एक हाथ मे दंड गले मे रुद्राक्ष की माला लिए भगवान् का विग्रह अत्यन्त ही शांत दिखाई देता है |यहाँ पहुच कर मैंने भगवान् का दुग्धाभिषेक करवाया |मन ही मन अपने और अपने परिवार की दीर्घायु एवं अच्छे स्वस्थ की कामना कर आगे बढ़ी |मन्दिर एक छोटी सी पहाडी पर स्थित है ,रास्ते मे वर्तमान कलाकृति द्वारा भगवान् के जीवन चरित्र की कई प्रतिमाये मन को लुभाती है |रास्ते मे कई मंडपम है |
"कदम्ब "यहाँ का स्थल वृक्ष है |इस वृक्ष की कतारों से बनी एक वीथी दक्षिण गिरी वीथी है |
शरवन पौंइंगे "तालाब स्थल तीर्थ के रूप मे है |यहाँ प्रायः आने वाले भक्त "कावडी "उठा कर आते है |

"कावडी "के विषय मे कहा जाता है |एक बार शिवजी ने शिवगिरी और शक्ति गिरी नामक दो पहाड़ आगस्त को दिया और कहा की इसे दक्षिण मे स्थापित कर आए |आगस्त ने यह कार्य अपने शिष्य "इदुम्बन "को सौप दिया इदुम्बन ने पहाडो को कावडी की तरह उठा कर दक्षिण की और चल पड़ा |पलनी पहुच कर वो कवडी रूपी गिरियो को वहां रख कर सुस्ताने लगा |उसी समय माता-पिता से क्रुद्ध सुब्रमनियम स्वामी (कार्तिके )वहा से गुजरते हुए पहाडी पर खड़े हो गए और जब थोड़े देर के विश्राम के बाद इदुम्बन ने गिरी को उठाना चाह तो वो उठा नही पाए |गुरु के कार्य मे विघ्न देख इदुम्बन भगवान् से ही लड़ पडे जिससे पराजित हो इदुम्बन मूर्छित हो कर जमीं पर गिर पड़े |यह देख इदुम्बन की पत्नी ने भगवान् सुब्रमनियम स्वामी से उन्हें अभयदान देने की प्रार्थना की और कहा की वह यही द्वारपाल के रूप मे खड़ा रह कर कवडी ले कर दर्शन आने वाले लोगो को विशेष आर्शीवाद दे कर आपके सानिध्य पहुचायेगा |पत्नी की यह बात भगवान् ने स्वीकार कर लिया और आज भी इदुम्बन का विग्रह द्वारपाल के रूप मे प्रवेश द्वार पर स्थापित है |                                                                                        कहा जाता है |जनवरी तैपुषम ,अप्रैल मे पगुनी उत्रं ,जून मे विशाख़म और नवम्बर मे स्कंधषष्ठी ,यहाँ के प्रधान त्यौहार है |भगवान् के दर्शन के लिए कृतिका नक्षत्र शुभ माना जाता है |पहाड़ मे भी भगवान सुब्रमनियम स्वामी का मन्दिर है |जहा वह अपनी दो पत्नी के साथ स्थापित है |मन्दिर मे ही प्रवेश द्वार पर गणपति मन्दिर है |मुझे आज भी वो दिन याद है जब गणपति दर्शन कर जैसे ही आगे बढ़ी मुझे एक रजत से बनी "वेळी "जिसे दंड कहते है पड़ी मिली |भक्ति से उन्मुक्त साधक इस वेळी का प्रयोग मुख मे भेदन करने के लिए करते है |इसे प्रसाद समझ कर हमने अपने पास रख लिया था |यहाँ आने के बाद एक दिन रात को स्वप्न मे एक बालक के दर्शन हुए हाथ मे दंड ले कर बोला मेरा डंडा वापस करो ,और मैंने कहा यह डंडा वापस नही करुगी जागने पर तभी याद आया की यह कोई नही स्वयं भगवान् कार्तिके ही है ,दुसरे ही दिन मैंने दंड का मूल्य मन्दिर के पते पर भेज दिया |आज भी यह दंड मेरे पास सुरक्षित है |जो मुझे सन्मार्ग मे ही प्रेरित कर रहा है |दक्षिण भारत वास्तव मे देवो की नगरी है |यहाँ आने के बाद मनो मेरा जीवन धन्य हो गया हो |
दक्षिण भारत मे सुब्रमनियम स्वामी के मुख्या स्थान है |तिरुतान्नी ,पलनी ,तिरुचेंदुर ,तिरुपरमकुन्नम ,पंमुदिर शौले ,और स्वामिले |यहाँ कर "प्रवज्या योग "अर्थात सन्यास योग का महत्व जाना |भगवान् सुब्रमनियम स्वामी सबको अनुग्रह प्रदान करे |